भागवत गीता पढना क्यो जरुरी है ?
भागवत गीता के बारे में भगवान ने स्वयं कहा है
अहं त्वां सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:
(भगवद् गीता १८।६६) ।
भगवान जिम्मेदारी लेते हैं । जो भगवान के प्रति अात्मसमर्पण करता है, वे जिम्मेदारी लेते हैं उद्धार की, पापों की सभी प्रतिक्रियाओं से उद्धार करेंगे ।
मल निर्मोचनं पुंसां
जल स्नानं दिने दिने
सकृद गीतामृत स्नानम
संसार मल नाषनम्
(गीता महात्मय ३)
मनुष्य जल में स्नान करके नित्य अपने को स्वच्छ करता है, लेकिन यदि भगवद्- गीता रूपी पवित्र गंगा जल में एक बार स्नान करता है, उसका, भवसागर की मलीनता से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाता है ।
गीता सुगीता कर्तव्या
किमन्यै: शास्त्रविस्तरै:
या स्वयं पद्मनाभस्य
मुखपद्माद विनि:सृता
(गीता महात्मय ४)
चूंकी भगवद्- गीता भगवान के मुख से निकली है, अतएव लोगों को ... लोगों को अन्य सभी वैदिक साहित्य पढ़ने की अावश्यक्ता नही है । अगर वह केवल ध्यानपूर्वक और नियमित रूप से पढ़ता अोर सुनता है भगवद्- गीता, गीता सुगीता कर्तव्या ... और मनुष्य को यह करना ही चाहिए । गीता सुगीता कर्तव्य किमन्यै: शास्त्र-विस्तरै: । क्योंकि वर्तमान युग में लोग इतने व्यस्त हैं संसारिक कार्यों में, कि समस्त वैदिक साहित्य में अपना ध्यान लगना शायद ही संभव हो। केवल यह एक ही साहित्य पर्याप्त है क्योंकि यह समस्त वैदिक साहित्य का सार है, और विशेष रूप से इसका प्रवचन भगवान ने किया है ।
भारतामृत सर्वस्वं
विष्णु वक्त्राद्विनि:सृतम्ऐ
गीता-गंगोदकं पीत्वा
पुनर्जन्म न विद्यते
(गीता महात्मय ५)
जैसा कि कहा जाता है कि जो गंगाजल पीता है, उसे भी मुक्ति मिलती है, तो भगवद्- गीता की क्या बात करें ? भगवद्- गीता महाभारत का अमृत है, और मूल (भगवान कृष्ण) नें स्वयं सुनाया है । भगवान कृष्ण मूल हैं ।
विष्णु वकृताद्विनि:सृतम । यह भगवान हरि के मुख से निकली है । और गंगोदकं, गंगा, भगवान के चरणकमलों से निकली है, और भगवद्- गीता भगवान के मुख से निकला है। निस्सन्देह, भगवान के मुख तथा चरणों के बीच कोई अंतर नहीं है । लेकिन निष्पक्ष अध्ययन से हम पाऍगे कि भगवद्- गीता गंगा जल की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है ।
सर्वोपनिषदो गावो
दोग्धा गोपालनन्दन:
पार्थो वत्स: सुधीर् भोक्ता
दुग्धं गीतामृतं महत्
(गीता महात्मय ६)
यह गीतोपनिषद् गाय के तुल्य है, और भगवान ग्वालबाल के रूप में विख्यात हैं, अौर वे इस गाय को दुह रहे हैं । सर्वोपनिषदो । और यह समस्त उपनिषदों का सार है और गाय का रूप लेती है । और भगवान दक्ष ग्वालबाल होने के कारण, वे गाय को दुह रहे हैं । और पार्थ वत्स: । और अर्जुन बछड़े के समान है । और सुधीर भौक्ता । और सारे विद्वान तथा शुद्ध भक्त, वे इस दूध का पान करने वाले हैं । सुधीर भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् । अमृत, भगवद्- गीता का अमृतमय दूध, विद्वान भक्तों के पान के लिए है ।
एकं शासत्रं देवकीपुत्रगीतम्
एको देवो देवकीपुत्र एव
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि
कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा
(गीता महात्मय ७)
अब दुनिया को भगवद्- गीता से सबक सीखना चाहिए । एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतम्। केवल एक शास्त्र है, सारे विश्व के लिए केवल एक शास्त्र है, सारे विश्व के लोगों के लिए, और वह है ये भगवद्- गीता । देवो देवकीपुत्र एव । और एक ईश्वर सारे विश्व के लिए, श्री कृष्ण हैं ।
और एको मन्त्रस्यतस्य नामानि । और एक मंत्र, मंत्र, एक ही मंत्र, एक प्रार्थना, या एक मंत्र, उनके नाम का कीर्तन हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे,
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ।
एको मंत्रस्तस्य नामानि यानि कर्मापि एकं तस्य देवस्य सेवा । और केवल एक ही कार्य, परम भगवान कृष्ण की सेवा करना ।
अगर व्यक्ति भगवद्- गीता से सीखता है, तो लोग अत्यन्त उत्सुक हैं एक धर्म, एक ईश्वर, एक शास्त्र, तथा एक वृत्ति के लिए । यह भगवद्- गीता में संक्षेप किया गया है । कि एक ईश्वर, श्री कृष्ण हैं ।
जिसने जीवन में गीता को उतार लिया वो सभी मोह माया और बन्धन से मुक्त होकर श्री कृष्णा के लोक जाता है और कोई भी भौतिक वस्तु का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता है बस उसके बाद तो एक ही मान करता है श्री कृष्णा से प्रेम करने का उनके प्रेम मे खो जाने का एवम् सभी चर चारा चर में श्री कृष्णा का दर्शन होता है और व्यक्ति अपने सभी कर्म कृष्णा को अर्पित कर देते है तथा अपना सम्पूर्ण जीवन कृष्णामय और परहित में लगा देते है
परमानंद वास्तव में श्री कृष्णा के प्रेम में ही है जो कृष्णा कृष्णा को अपना बना लेते है और खुद श्री कृष्णा के हो जाते है उनका तो वर्णन करना भी असम्भव है इसलिये ही जब श्रीकृष्णचन्द्र के भक्तो का वर्णन ही असम्भव है तो सोचिये हम श्रीकृष्णा का वर्णन कैसे कर सकते है क्योंकि देवता गण भी उनकी माया से मोहित हुये है तो हम क्या है इसलिये है श्रीकृष्ण से प्रेम करे श्रीकृष्ण के लिये अपने आप को अर्पित कर दे।
*श्री कृष्णा का वर्णन अनंत है अपार है*
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